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July 28, 2026
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अखिल भारतीय किसान सभा ने कच्चे कपास पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क समाप्त करने के केंद्र सरकार के फैसले की निंदा की

केंद्र सरकारने कच्च्या कापसावरील 11% आयात शुल्क हटविल्याचा निर्णय शेतकरीविरोधी असल्याची अखिल भारतीय किसान सभेची टीका; सर्व शेतकऱ्यांना आंदोलनाचे आवाहन.

अखिल भारतीय किसान सभा ने कच्चे कपास पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क समाप्त करने के केंद्र सरकार के फैसले की निंदा की

किसान सभा ने देश के सभी किसानों से केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने का आह्वान किया

अशोक ढ़वले  , विजू कृष्णन

अखिल भारतीय किसान सभा, आरएसएस-भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा कच्चे कपास पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क समाप्त करने के फैसले की कड़ी निंदा करती है। यह निर्णय केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) द्वारा अधिसूचित किया गया है और 19 अगस्त से 30 सितंबर 2025 तक प्रभावी रहेगा। इस फैसले से आयातित कपास की कीमतों में गिरावट आएगी, जिससे घरेलू कपास की कीमतें भी गिरेंगी। भारत के छोटे कपास उत्पादक, अमेरिका के बड़े औद्योगिक स्तर के किसानों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से भारी सरकारी सब्सिडी मिलती रही है।

इस निर्णय का तात्कालिक प्रभाव बहुत गंभीर होगा क्योंकि देश के अधिकांश कपास उत्पादक क्षेत्रों में किसान दो महीने पहले ही बुवाई कर चुके हैं और उन्हें अपने उत्पाद के लिए उचित मूल्य की उम्मीद में भारी लागत लगानी पड़ी है। यह निर्णय उस समय आया है जब किसान अपनी फसल की कटाई की तैयारी कर रहे हैं। भारत के कपास उत्पादक क्षेत्र पहले से ही कृषि संकट और किसान आत्महत्याओं के लिए बदनाम हैं। यह निर्णय किसानों को और अधिक कर्ज में डुबो देगा तथा उनकी आर्थिक स्थिति को और बदतर बना देगा।

विडंबना यह है कि इस किसान विरोधी फैसले के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में कहा था कि, वह “किसानों, मछुआरों व पशुपालकों पर असर डालने वाली किसी भी नीति के खिलाफ दीवार की तरह खड़े हैं” और “भारत कभी भी किसानों, मछुआरों व पशुपालकों के हितों से समझौता नहीं करेगा।” लेकिन मोदी सरकार द्वारा लगातार अपनाई जा रही साम्राज्यवाद पक्षीय नीतियाँ भारत के हितों की रक्षा नहीं कर सकीं, विशेष रूप से उस व्यापार युद्ध में जो ट्रंप द्वारा शुरू किया गया है। अमेरिका ने भारत से आयातित वस्त्र पर 50 प्रतिशत  से अधिक का शुल्क लगा दिया है। इस स्थिति को संभालने के लिए मोदी ने भारत के कपास किसानों को सजा दी है, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में सबसे कमजोर कड़ी हैं।

नवउदारवाद के दौर में भारतीय कपास किसानों को राज्य और पूंजी के गठजोड़ ने इनपुट व आउटपुट दोनों पक्षों से निचोड़ा है। प्रधानमंत्री के रूप में अपने 11 साल के कार्यकाल में मोदी ने कभी भी सी2+50 प्रतिशत फॉर्मूले के अनुसार कपास किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) नहीं दिया। उदाहरण के लिए, कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) द्वारा 2025 खरीफ सीजन के लिए कपास का एमएसपी 7710 रुपये प्रति क्विंटल तय किया थे। यदि सी2+50 प्रतिशत फॉर्मूला लागू होता, तो यह मूल्य 10075 रुपये  प्रति क्विंटल होना चाहिए था। सरल भाषा में कहें तो, भारतीय कपास किसानों को वर्तमान में प्रति क्विंटल 2365 रुपये कम एमएसपी मिल रही है। यह अपने आप में किसानों के साथ स्पष्ट विश्वासघात है। यदि कपास की कीमतें और गिरती हैं, तो यह किसानों की सीधी लूट होगी।

अमेरिका का यह दोहरापन भी अच्छी तरह सर्वविदित है कि, उसने ही भारत सरकार पर दबाव बनाया है कि वह भारतीय कपास किसानों को मिलने वाले सरकारी समर्थन में कटौती करे। यह अनुमान लगाया गया है कि अमेरिका में सरकारी सब्सिडी कपास के कुल उत्पादन मूल्य के 12 प्रतिशत के बराबर है, जबकि भारत में कपास किसानों को सरकारी सहायता उत्पादन मूल्य के लगभग 2.37 प्रतिशत के बराबर है। सरकार द्वारा मिलने वाले समर्थन में यह भारी असमानता अमेरिका को विकासशील देशों के कपास उत्पादकों के ऊपर अनुचित बढ़त प्रदान करती है।

सरकारी समर्थन में यह बड़ा अंतर और अमेरिका व भारत के किसानों के उत्पादन पैमाने में भारी अंतर मिलकर भारतीय किसानों को भारी नुकसान की स्थिति में डालते

यह भी याद रखना जरूरी है कि अमेरिका, भारत पर अन्य कृषि उत्पादों के लिए भी अपने बाजार खोलने का दबाव बना रहा है। जब तक किसान भारत सरकार को यह स्पष्ट नहीं कर देते कि ऐसे किसान विरोधी फैसलों को बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे, तब तक यह संभावना है कि मोदी सरकार अमेरिका के दबाव में अन्य फसलों के लिए भी ऐसे ही निर्णय ले।

अखिल भारतीय किसान सभा, सभी किसानों से एकजुट होकर इस फैसले के खिलाफ तीखा आंदोलन खड़ा करने का आह्वान करती है ताकि सरकार को यह फैसला वापस लेने के लिए मजबूर किया जा सके।

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